राजस्थानियों के लिए गौरवशाली ऐतिहासिक विरासतें हैं गर्व की बात, दीनदयाल मुरारका ने कहीं ये बड़ी बात…

0
17
मनोरंजन की दुनिया में अपना वजूद तलाशत रहीं राजस्थानी फिल्में
राजस्थानियों के लिए गौरवशाली ऐतिहासिक विरासतें हैं गर्व की बात
Share

मनोरंजन की दुनिया में अपना वजूद तलाशत रहीं राजस्थानी फिल्में

– NDI24 नेटवर्क
मुंबई. फिल्में सदा से किसी भी संस्कृति के फैलाव का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं, फिर भी इस पैमाने पर यदि हम राजस्थानी फिल्मों का मूल्यांकन करें, तो परिणाम चिंताजनक दिखता है। पूरी दुनिया में वीरता, त्याग और बलिदान की धरती के रूप में पहचाने जाने वाले राजस्थान की संस्कृति के फैलाव में राजस्थानी भाषा की फिल्में जो भूमिका अदा कर सकती थीं, वो अब तक नहीं कर पायी हैं। सभी राजस्थानियों के लिए यह गर्व की बात है कि उनके पास विश्व की सबसे गौरवशाली ऐतिहासिक विरासतें हैं। स्वर्णाक्षरों में अंकित राजस्थान के लोकेशन और सिचुएशन आज की पीढ़ी के लिए भी जिज्ञाषा और आकर्षण का केंद्र हैं। इस लिहाज से मनोरंजन जगत के लिए राजस्थान की धरती हमेशा उर्वर भूमि साबित होने के साथ ही छोटे और बड़े दोनों ही पर्दों पर सफलता में राजस्थानी संस्कृति एक मजबूत आधार रही है। हिन्दी सिनेमा और टेलीविजन के इतिहास के हर दौर में राजस्थानी संस्कृति को दिखाती फिल्मों और धारावाहिकों ने लोकप्रियता का परचम लहराया है। उक्त बातें राजस्थानी फ़िल्म एस के उपाध्यक्ष दीनदयाल मुरारका ने बुधवार को एक कार्यक्रम में आयोजन में कहीं।

व्यक्ति सोचता और चिन्तन-मनन करता है…

राजस्थान के इतिहास को याद करते हुए मुरारका आगे कहते हैं कि यहां सवाल केवल राजस्थानी संस्कृति के राजस्थान से बाहर फैलाव के संदर्भ में नहीं है, बल्कि राजस्थान और अन्य प्रदेशों-देशों में पलने वाली नयी पीढ़ी से जुड़ा है। क्योंकि मातृ भाषा ही परम्पराओं और संस्कृति से जोड़े रखने की एक मात्र कड़ी है। मातृभाषा के भीतर भावना, विचार और जीवन पद्धति शामिल रहती है। मनोवैज्ञानिकों की यह स्पष्ट मान्यता है कि सम्प्रेषण की भाषा वही होना चाहिए, जिस भाषा में संबंधित व्यक्ति सोचता और चिन्तन-मनन करता है। वे मानते हैं कि इससे संप्रेषणीयता सटीक और सहज तो होती ही है, साथ-साथ व्यक्ति की ग्रहण क्षमता और कार्य क्षमता भी अधिक होती है। मातृ भाषा बच्चों को आत्मविश्वासी और योग्य बनाती है। इस लिहाज से देखें तो राजस्थानी संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण राजस्थानी भाषा में ही होना जरूरी है। देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के बरक्स यदि राजस्थानी फिल्मों का सिंहावलोकन करें, तो हम पाते हैं कि हमारी शुरुआत कोई अन्य के मुकाबले बहुत देर से नहीं हुई है। पहली राजस्थानी फिल्म सन 1942 में ही आ गई थी, लेकिन सफर पर नजर दौड़ाते ही चित्र आशानुकूल नहीं दिखता।

राष्ट्रीय पुरस्कारों में अपना झंडा फहराया…

आज दक्षिण भारत की फिल्में हिन्दी सिनेमा को टक्कर दे रही हैं। इसी तरह बंगला और उड़िया भाषा की फिल्में देश के राष्ट्रीय पुरस्कारों में अपना झंडा फहरा रही हैं। भोजपुरी फिल्मों की तो शुरुआत भी काफी साल बाद, सत्तर के दशक में मानी जाती है। लेकिन प्रदर्शन के स्तर पर सात समुदंर पार पहुंच गई हैं। दूसरी तरफ राजस्थानी फिल्में अपने ही प्रदेश में दुर्दशा की शिकार हैं और उपेक्षित होकर आज भी अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही हैं। इसके कई कारण हैं। अन्य प्रांतों की सरकारों ने अपनी भाषा की फिल्मों के लिए तमाम सहूलियत देने के साथ ही राज्य के थियेटरों के लिए भी गाइडलाइन जारी कर दिया, जिसे हर हाल में उन्हें मानना होता है। इससे संबंधित भाषा की फिल्मों को दर्शकों की उपलब्धता सुनिश्चित हो गई है। देश के आर्थिक विकास में सबसे बड़ा योगदान देने वाले राजस्थानियों की अपनी ही भाषा की फिल्मों की दयनीय स्थित पर आज सबको गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
Share

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here